मैं, लपकझुन्ना और हमारा प्रेम 2 : सावन
अक्सर लोग पूछते है की प्रेम होता है तो पता कैसे चलता है, इन सवालों के जवाब मेरे पास भी नही थे और जानने की कोशिश मैने किया भी नही, जिंदगी दौड़ती रही मैं भी चलता रहा, पर जब लपकझुन्ना जिंदगी में आई तब पता चला कि प्रेम होता क्या है, उनके आने के बाद मैने ज़िंदगी को एक हद तक सम्हाल लिया उन्होंने मदद जो कि, उनके आने के बाद मैने फिर किसी परस्त्री को पलटकर देखा नही, मैने उनके बाद हर वो गलत काम छोड़ दिया जो मेरी आदतों में शुमार था, उनको ले के मैं इतना प्रोटेक्टिव हूं की अगर वो रो दे, उदास हो जाए तो मेरी हालत खराब हो जाती है, अगर उनको कुछ चाहिए होता है तो मैं उन्हें वो चीज किसी भी कीमत पे देने के लिए उतारू हो जाता हूं। उनकी तबियत खराब हो जाए तो मेरी भूख तक मिट जाती है, उनके पापा उन्हें डांट दे या मां बोल दे और वो रो दे तो मुझे रोना आ जाता है। घर पे अक्सर पकड़ी जाती मेरे से बात करते हुए तो उनके पकड़े जाने के बाद मैने मन्नत में वो सब छोड़ दी जो मैं छोड़ सकता था ताकि भगवान उनपे कोई मुसीबत ना दे, मैने अपने प्रेम के लिए नॉनवेज से वेज तक का सफर किया जब वो पहली बार घर में पकड़ी गई थी, मैने अक्सर उनके खुशी के लिए हर मंदिर माथा टेक देता हूं वो खुश रहें और मेरे साथ रहें।
शायद उनके परिवार को समझाने के लिए हम दोनो को अभी और वक्त लगेगा। क्योंकि उनके पिता जी मुझे सुनना नही चाहते और मैं हू की अपनी लपकझुन्ना के बिना इस सफर में बढ़ना नही चाहता, मैं ठहर जाना पसंद करूंगा पर उनके बिना आगे बढ़ना कत्तई पसंद नहीं करूंगा। पिता अक्सर बच्चों की खुशी के लिए मान जाते है ये भी मान जायेंगे अगर जो एक बार मुझे सुन लेंगे तब उन्हें एहसास हो की मैं बुरा और गलत नहीं हूं उनकी इज्जत भी मेरी इज्जत है, और मैं खुद की इज्जत क्यों बर्बाद करूंगा या अपने परिवार की इज्जत पे क्यों आंच आने दूंगा।
सुनो लपकझुन्ना एक रोज आओगी इस उम्मीद में अनंत तक के इंतज़ार में,
तुम्हारा सावन
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