मैं और मेरी प्रेम कहानी : सावन

मेरी प्रेम कहानी ज्यादा बड़ी नहीं है पर उलझी बहुत ज्यादा है, शायद इतना आसान नहीं है 'मैं' बन पाना बस ज़िंदगी के उस मोड़ पे खड़ा हू जहां अपनी प्रेयसी के पिता के सामने भीख मांगने पे अगर वो अपनी बेटी का हाथ दे दे तो मैं वो भी कर लूं, वो कहते है न की प्रेम में कुछ भी, अगर वो मेरी पगड़ी भी मांग ले, मेरी तो, वो भी मैं सहर्ष स्वीकार कर लूं, जिंदगी के 28 साल मां, बाप, भाई, दोस्त के साथ गुजार लिए पर ये साथ हमेशा तो नही ना रह सकते है न, सब की एक निजता की ज़िंदगी होती है कब तक साथ रहेंगे, तब ज़रूरत होती है एक हमसफर की जो आगे के 30 साल साथ दे आगे बढ़ने में,भविष्य बनाने में और ये बहुत क़िस्मत से मिलते है, ऐसे भरोसेमंद हमसफर जिनकी परवरिश अच्छी होती है वही आगे की पारिवारिक जिंदगी में खुशियां लाते है, वर्ना जिस हिसाब से कत्ल हो रहे है, शादी बाद जिंदगी बर्बाद हो रही है कौन जाने किसका हश्र कैसा हो ?            तो मेरे लिए भगवान ने, बाबा विश्वनाथ जी ने एक आशीर्वाद रखा सम्हाल के मेरी लपकझुन्ना। खैर वो लड़की मेरे लिए और मेरे भविष्य के लिए हमेशा ही एक सही चुनाव है। ये ना उनके घरवालों को एहसास है ना ही मेरे घर वालो को था, मैने तो अपने माता पिता को मना लिया है, थोड़ा सा रूठे वो, गुसाए, वो लड़े भी मेरे से, शायद उन्हें लगा की ये बचकाना हरकत होगा, या फिर मेरा गलत फैसला पर जब मैं अपनी बात पे अड़ा रहा उन्हें समझाया की पापा मम्मी आप के बाद आप जैसा कोई मिला है तो गलत क्या है कब तक आप साथ रहोगे मेरे, इसलिए जो मिली है वो आप के बाद मुझे सम्हाल सकती है, रही बात समाज की तो समाज को मौका ही नही दूंगा आप की इज़्ज़त पे अंगुली उठाने का इसका वादा है, तब जा के माने वो।

पर किसी को नही मना पा रहा तो वो है मेरी लपकझुन्ना के घर वाले, वो मेरी बात सुनना ही नही चाहते है, एक बार मेरी बात सुन तो लेते एक मौका तो सबको मिलता है बात रखने का, इतना तो मैं भी चाहता हूं फिर वो जो कहेंगे मैं करूंगा, अगर वो चाहते है तो मैं अपने मां पापा को भेज सकता हूं रिश्ते के लिए पर वो मान तो जाए, मैं उनके इज़्ज़त पे कोई आंच नहीं आने दूंगा, मैं सब सम्हाल लूंगा इतना खुद पे यकीन है, पर एक मौका दे दे वो जिसका मैं हकदार हूं।

मैं बाबा विश्वनाथ जी की कसम खा के कहता हूं कि वो नही तो कोई और नहीं आएगी पूरी जिंदगी अकेले उसके इंतजार में गुजार दूंगा जानता हूं आसान नहीं है पर मुमकिन भी नही है, वादों का पक्का हूं लपकझुन्ना 

बस उम्र के उस पड़ाव में जब किसी का हाथ चाहिए होता है उठने के लिए टहलने के लिए, या जो ख्वाब साथ देखे थे अस्सी की आरती देखने का वो शायद मुझे अकेले पूरा करना होगा, अगर तुम्हारे पापा नही माने तो 


तुम्हारे इंतजार में अनंत तक का सफ़र लिए हुए 


'सावन'


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